सेमिनार के आलेख

बैंकिंग उद्योग में धोखाधड़ी के कारण एवं निवारण

भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी कहे जाने बाले भारतीय बैंक  राष्ट्र के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान देते आ रहें हैं। वर्ष 1969 में बैंको के राष्ट्रीयकरण के बाद संभतः यह प्रथम अवसर है जब देश के प्रायः सभी सरकारी बैंक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस से पूर्व वे कठिन दौर से नहीं गुजरे, लेकिन तब उसका प्रभाव एक, दो या कुछ बैंको तक ही सीमित था। इस बार स्थिति भिन्न है। एक या दो नहीं, अपितु 11 बैंको ने मार्च 2016 में घाटा दिखाया, अनर्जक आस्तियां अर्थात एनपीए लगातार बढ़ रहे हैं, वैश्विक स्तर पर बैंको में धोखाधड़ी के मामले दिन-प्रतिदिन तूफान की रफ़तार से बढ़ रहे हैं, पूंजी की जरूरत सभी बैंको को है, अनुभवी स्टाफ की कमी से सभी बैंक जूझ रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि इन समस्याओं से जूझते-जूझते कारोबार विशेषतः ऋण विस्तार का मुख्य कर्तव्य कहीं पीछे छुट गया है। इस सबके बीच आशा की किरण यह है कि इस बार सरकार बैंको के साथ खड़ी नजर आ रही है और बैंकिंग उद्योग की गाड़ी वापस पटरी पर लाने की हर संभव कवायत की जा रही है।  

इस प्रकार से बैंकिंग उद्योग को अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैं उनमे प्रमुख है, बैंकिंग उद्योग में धोखाधड़ी । सन 1990  में वैश्वीकरण एवं 1991 में ई- तकनीकी  की शुरुआत बैंकिंग व्यवसाय में हुई। जिसका उद्देश्य वैश्वीकरण के माध्यम से उदार व्यापारिक नीति स्थापित करनी थी ताकि वैश्विक स्तर पर लोगो को व्यापार करने में किसी भी प्रकार की समस्या का सामना न करने पड़े । व्यापार करने के लिए उन्हे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सीमा बंधन न हो। इसके लिए समस्त राष्ट्र एक मत हुये एवं वैश्वीकरण ने व्यवसाय की परिभाषा ही बदल कर रख दी। बड़े- बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होने लगा जिससके परिणामस्वरूप व्यापारियों को अधिक मुद्रा की आवश्यकता होने लगी जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के वित्त पोषण एवं जमानत की आवश्यकता व्यापारियों को पड़ने लगी ।  बैंको के व्यवसाय में वृद्धि होने लगी । इसके लिए वैश्विक स्तर पर अनेकों प्रकार की वित्त संबंधी योजनाओं का विकास हुआ। वहीं दूसरी और व्यवसाय में वृद्धि होने से व्यापारियों को अधिक नगद मुद्रा पर निर्भर करना पढ़ता था।  अब वैश्विक स्तर पर व्यापारियों को नगद मुद्रा से लेन-देन संबन्धित कठिनाइयों का सामना करना पढ़ रहा था  परिणामस्वरूप बैंको ने बैंकिंग व्यवसाय में ई- बैंकिंग तकनीक के प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया। ग्राहकोंमुखि नई-नई ई- तकनीक का बैंको में आविस्कार होने लगा। इस तकनीकी के प्रयोग से व्यापारियों को व्यवसाय में बढ़ा लाभ हुआ, अब उनको नगद मुद्रा के प्रयोग से राहत मिलने लगी, एक देश से दूसरे देश में वैश्विक स्तर पर व्यापार बढ़ने लगा क्योंकि अब ई- भुगतान होने शुरू हो गए थे जिससे भुगतान जोखिम की समस्या खत्म हो रही थी। अब सभी देश व्यापरिक रूप से जुड़ रहे थे । ई-बैंकिंग से व्यापार में जहां एक और नया आयाम देखने को मिला वहीं बैंको के समक्ष कई चुनौतियों खड़ी हो गईं जिनमे जो प्रमुख दी उनमें तकनीकी के माध्यम से गलत तरीके से किसी अन्य व्यक्ति विशेष के खाते में से निकाला गया धन। यह एक वैश्विक स्तर पर बैंको के समक्ष एक जटिल समस्या बनती जा रही है जिसने सम्पूर्ण विश्व को गहन चिंतन में डाल दिया।

हमारे देश में पहली बार जुलाई 1970 में बैंको का बैंक कहे जाने बाले भारतीय रिजर्व बैंक ने धोखाधड़ी के लिए संसोधन पास किया था एवं उसने उसकी परिभाषा इस प्रकार से दी थी।  

“A deliberate act of omission or commission by any person, carried out in the course of a banking transaction or in the books of accounts maintained manually or under computer system in banks, resulting into wrongful gain to any person for a temporary period or otherwise, with or without any monetary loss to the bank”.

"किसी भी व्यक्ति द्वारा चूक या आयोग के एक विचार अधिनियम, एक बैंकिंग लेनदेन के पाठ्यक्रम में या लेखा बहियों में किए गए स्वयं या बैंकों में कंप्यूटर प्रणाली के तहत एक अस्थायी अवधि के लिए या अन्यथा किसी भी व्यक्ति को गलत तरीके से लाभ में जिसके परिणामस्वरूप बनाए रखा, के साथ या बैंक के लिए किसी भी मौद्रिक हानि के बिना।

धोखाधड़ी के मामलों को भारतीय संविदा अधिनियम (Indian contract act 1872) में स्थान दिया गया है ।

हमारे देश में बैंको में धोखाधड़ी के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ रहें हैं। प्राप्त आंकड़ो के अनुसार सन 2009-10 में 2038 करोड़ के धोखाधड़ी के मामले सामने आए वहीं सन 2012-13 में इनकी संख्या में चार गुना बढ़ोतरी हुई इससे प्रतीत होता है कि कितने तीव्र वेग से यह बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त भारतीय रिज़र्व बैंक, भारतीय बैंक एवं सभी वित्तीय संस्थाएँ धोखाधड़ी से निपटने के लिए अनेक प्रकार से अपनी- अपनी तैयारियां कर रहीं हैं किन्तु फिर भी धोखाधड़ी के उन्मूलन में संतोषजनक परिणाम नहीं सामने आ रहें हैं आज जितनी हमारे पास सुरक्षित एवं सरल बैंकिंग तकनीक है तो वहीं दूसरी और उनके पास इस तकनीक को भेदने के उपाए हैं।

सबसे ज्यादा धाखाधड़ी के मामले समाशोधन, जालसाजिया, असत्यकरण, एटीएम, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड एवं इंटरनेट बैंकिंग में किए गए हैं। असोशिएशन ऑफ सर्टिफाइड फ़्रौड एक्जामनिसन (ACPE) 2002 की रिपोर्ट के अनुसार प्रति वर्ष हर वित्तीय संस्था को 5 विलियन का वित्तीय घाटा धोखाधड़ी के मामलों में होता है। सन 2011 में $ 3.5 ट्रिलियन का वित्तीय घाटा वैश्विक स्तर पर धोखाधड़ी के कारण हुआ था । इस प्रकार से धाखाधड़ी हमारे वैश्विक स्तर पर एक मुख्य चुनौती बनी हुई है एवं इसकी जड़े बहुत मजबूत हो रहीं हैं क्योंकि हर वर्ष इसकी संख्या में अमूमन दो तिहाई की वृद्धि हो रही है। धोखाधड़ी करने के लिए समाज के असामाजिक तत्व बैंकिंग प्रणाली के हर प्रकार की प्रतिक्रिया से अवगत होते हैं। इनमें कुछ लोग तो तकनीकी विशेषज्ञ भी होते हैं उन्हे हम सामान्य भाषा में हैकर कहते हैं। ये लोग बैंकिंग प्रणाली में वैश्विक स्तर पर नजर रखते हैं एवं डाटा हैंकिंग, स्टीलिंग, फिसिंग, मेलिंग, स्काम जैसे कई प्रकार के तरीको को इस्तेमाल वे धोखाधड़ी करने के लिए करते हैं। इनके अतिरिक्त भी ये असामाजिक तत्व बैंको के ग्राहक भी होते हैं एवं बैंक में पहले है अपना अच्छा व्यवहार बनाते हैं इसके बाद ये जाली दस्तावेज़ के माध्यम से बैंक के साथ धोखाधड़ी करते हैं।

चूँकि बैंक एक वित्तीय संस्था है एवं इस संस्था पर आम लोग अपनों से ज्यादा भरोसा करते हैं उनमे ये विश्वास होता है कि बैंक में रखा गया हमारा पैसा एक सुरक्षित हाथों में हैं एवं समय आने पर यह हमें सरलता एवं सुगमता के साथ सब्याज प्राप्त हो जाएगा किन्तु अगर यह पैसा उनको प्राप्त होने की बजह दूसरे लोगों के हाथों में चला जाये तो लोगो का बैंको के ऊपर से विश्वास हट जाएगा एवं बैंको की साख खतरे में पढ़ जायेगी लेकिन इसके लिए बैंको का बैंक कहे जाने बाले भारतीय रिज़र्व बैंक एवं अन्य संस्थाएँ अपने स्तर पर इस धोखाधड़ी के उन्मूलन में लगी हुई हैं एवं इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर भी कार्य चल रहा है।

 

31.03.2013 में हुये धोखाधड़ी के मामले

 

श्रेणी                                

मामलों की संख्या

राशि करोड़ में

कोमर्शियल बैंक

169190

29910.12

गैर- बैंकिंग वित्तीय संस्थाएँ

935

154.78

अर्बन-कॉपरेटिव बैंक

6345

1057.03

वित्तीय संस्थाएँ

77

279.08

कुल

176547

31401.01

 

आइये हम बैंकिंग उद्योग में धोखाधड़ी के कारणों को विस्तार पूर्वक समझते हैं।

 

बैंकिंग उद्योग में धोखाधड़ी के कारण

1.   केवाईसी मापदंड में चूक (अपने ग्राहको को जाने) :- भारतीय रिज़र्व बैंक ने केवाईसी अर्थात अपने ग्राहक को जाने के दिशा निर्देश सभी प्रकार की शासकीय एवं अर्धशासकीय बैंक, निजी बैंक, ग्रामीण बैंक एवं अन्य सभी प्रकार की वित्तीय संस्थायों को केवाईसी मापदंडो का अनिवार्य रूप से पालन करना सुनिश्चित किया है।  ओर ये सभी वित्तीय संस्थाएँ इन केवाईसी मापदंडो का अनुपालन भी कर रहीं हैं किन्तु फिर भी असामाजिक तत्वो द्वारा इन केवाईसी मापदंडो में भी सेंध लगा दी है अर्थात ये लोग जाली दस्तावेज़ बनाकर या फिर किसी की केवाईसी का दुरुप्रयोग कर उसके स्थान पर बैंको के साथ धोखाधड़ी कर लेते हैं हैरानी की बात तो ये है कि इन लोगों ने पैन कार्ड एवं इंकमटैक्स रिटर्न भी फर्जी बना लिए हैं और इनका इस्तेमाल गलत कामों में कर रहे हैं  किन्तु अगर यहीं बैंक से केवाईसी नियमों के पालन में कुछ चूक हो जाती है तो इसके परिणाम भयंकर होते हैं क्योंकि अगर अपने केवाईसी का अनुपालन नहीं किया है तो वह व्यक्ति आपको कहीं नहीं मिलेगा।

  1. साइबर क्राइम :- डिजिटल बैंकिंग की रह में सबसे बढ़ा रोढ़ा साइबर क्राइम है यह प्रत्येक वर्ष दुगुनी गति से बढ़ रहा है इसके प्रभाव से हर वर्ष विश्व में बैंको को 168.00 लाख करोड़ का घाटा उठाना पढ़ता है इस प्रकार से साइबर क्राइम बैंकिंग उद्योग में धोखाधड़ी का एक मुख्य कारण है।
  2. डाटा स्टीलिंग : डाटा स्टीलिंग से अभिप्राय लोगों के एटीएम, डेबिट एवं क्रेडिट  कार्ड, नेट बैंकिंग आदि में किये  जाने बाले धोखाधड़ी से है । प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा जालसाजी एवं धोखाधड़ी होती है एवं हर साल इसकी संख्या बढ़ रही है इसी कारण से लोग ई- बैंकिंग से कतराते हैं ।
  3. तकनीक का प्रयोग : ज़्यादातर लोगों को ई – बैंकिंग के प्रयोग का ज्ञान कम होता है क्योंकि इसके लिए हर व्यक्ति को इसका ज्ञान आवश्यक है । ई – बैंकिंग तभी सुरक्षित है जब आपको पता हो कि इसका प्रयोग किस प्रकार से करना है नहीं तो अधूरा ज्ञान उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है ग्राहक को इस बात की  पूर्ण जानकारी होनी चाहिये कि कब और किस जगह इसका प्रयोग सही होगा ।   इस प्रकार से लोगों को तकनीकी के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए जो कि एक डिजिटल बैंकिंग के लिए एक चुनौति है।

5.    जोखिम प्रबंधन की कमियाँ :- जब कोई ऋण प्रस्ताव स्वीकृति के लिए प्रबंधक कमेटी के पास आता है तब प्रबंधक आवेदनकर्ता के प्रस्तावों कि जाँच करता है यह जाँच दस्तावेजों पर निर्भर करती है जो कि आवेदक के द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं उदाहरण के रूप में  आयकर रिटर्न की फाइल, संपत्ति के दस्तावेज, मकान, जमीन के कागज, पता , संपत्ति का ब्योरा, प्लॉट की रजिस्ट्री, खसरा, सर्वे क्रमांक आदि इन सब दस्तावेजों के माध्यम से प्रबंधक समिति केवल आँकड़े प्राप्त करती है इन आँकड़ो के माध्यम से जानकारी प्राप्त पूर्णरूप से सत्य हो यह कहा नही जा सकता,

6.   जाली दस्तावेजों का प्रयोग : बैंकिंग प्रणाली में  कुछ मामले ऐसे भी सामने आये जिनमें उधारकर्ता द्वारा जाली कागजात लगाकर जानबूझकर बैंको को धोखा  दिया गया है इन मामलों सिर्फ उधारकर्ता ही नही बल्कि उसका साथ प्रशासन  के लोगों  ने पैसों  के लालच में  दिया और इसका खामियाजा बैंक प्रणाली को भुगतान पड़ता है । इस तरह के ऋण गैर निष्पादित संपत्ति (एन पी ए) की श्रेणी में  आ जाते हैं और वसूल करने मैं एक बड़ी चुनौंती का सामना करना पड़ता है इस प्रकार की धोखाधड़ी में बैंको को भरी हानि उठानी पढ़ती है।

7.    धोखाधड़ी :- उदाहरण के लिए गोल्ड ऋण लेने के लिए कोई ग्राहक गोल्ड के साथ  बैंक में आता है उसके गोल्ड कि गुणवत्ता, बाजार कीमत, बजन यह सब बैंक के गोल्ड मूल्यांकर्ता (ऐपराइजर) पर निर्भर करता है । बैंको मैं कई धोखाधढ़ी  के मामले सामने आये हैं जिनमें गोल्ड ऐपराइजर की भी भूमिका रही है ।

अब  मैं एक और उदाहरण देना जा रहा हूँ कोई ग्राहक गोल्ड ऋण के लिए शाखा में आया गोल्ड ऐपराइजर ने अपनी भूमिका वखूबी  निभाई और गोल्ड की गुणवत्ता, वजन, कीमत के आधार पर ऋण स्वीकृत कर दिया गया, कुछ दिनों वाद कोई शाखा में  आता है और शाखा प्रमुख को अवगत कराता है कि मेरा गोल्ड कुछ दिनों पहले चोरी हो गया था और जिसकी पुलिस रिपोर्ट मेरे पास है आपकी शाखा मैं जिसके ऊपर चोरी करने वाले को ऋण दिया गया है। इस तरह के मामलों मैं बैंको के साथ धोखाधढ़ी  होती है क्योकि जिसका गोल्ड होता है  वह पुलिस कार्यवाही के द्वारा प्राप्त कर लेता है इस तरह के मामलों मैं बैंको को हानि होती है

8.    विलफुल डिफ़ौल्टर :- बैंकिंग सैक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी कहे जाते हैं परंतु समाज के कुछ विशेष वर्ग के लोग इनका दुरुप्रयोग करते हैं, ऐसे लोग जिनके पास पर्याप्त साधन होने के बाबजूद भी बैंको को ऋण नहीं चुकाते इनकी संख्या वर्तमान में 5600 एवं इनपर बैंको का 58792 करोड़ रुपये बकाया है भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार यह भी धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।

9.    एटीएम:- 2015 के प्राप्त आँकड़ों के आधार पर 11997 क्रेडिट, डेबिट कार्ड एवं नेट बैंकिंग के धोखाधड़ी के मामले हुए जिनमे सर्वाधिक एटीएम के थे यह सत्य है कि बैंको ने ग्राहको ई-बैंकिंग की सुविधाएं प्रदान की किन्तु यदि हम इन सुविधाओं का प्रयोग उचित एवं श्रेष्ठ तरीके से नहीं करेंगे तो ये हमे वित्तीय नुकसान पहुँचा सकती है। अधिकतर ई-बैंकिंग ग्राहको को पता नहीं होता है कि किस प्रकार से और कहा हमे इसका प्रयोग करना चाहिए अकसर हमने कई ग्राहको को एटीएम में किसी अन्य व्यक्ति से सहायता लेते देखा है किसी भी व्यक्ति को क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड कि जानकारी आसानी से साझा कर देते हैं, नेट बैंकिंग का प्रयोग हम किसी भी उपकरण में एवं साइबर केफे में कर लेते हैं जो कि जोखिम भरा होता है।

10.  ई-मेल्स, फोन कॉल:- अकसर पाया जाता है कि हमे अनेक प्रकार के ई-मेल्स एवं फोन काल्स आते रहते हैं हाल ही में प्राप्त आंकड़ो के अनुसार फोन काल्स की घटनाएँ बड़ी तेज गति से बड़ी हैं फोन करने बाले हैकर ग्राहक को कहते हैं कि आपका एटीएम ब्लॉक हो गया है या आपका गिफ्ट आया है एवं में बैंक से बोल रहा हूँ इसके लिए हमें आपका खाता संख्या, एटीएम कार्ड एवं पिन का नंबर दीजिये, ग्राहक को ई- मेल्स आते हैं जिनमे लॉटरी एवं अन्य प्रकार का प्रलोभन दिया जाता है। इस प्रकार से इस तरह के मेल्स प्रचुर मात्रा में ग्राहको को प्राप्त होते रहते हैं एवं लोग लालच में आकर सूचनाएँ साझा कर देते हैं जिससे की उनको हानि उठानी पढ़ती है।

बैंको में धोखाधड़ी रोकने के उपाय

1.    प्लास्टिक मनी एवं एटीएम का सतर्कता के साथ प्रयोग :-बैंकिंग क्राइम में एटीएम प्रथम स्थान पर है अगर हम बैंक के ग्राहको को इसके प्रयोग से संबन्धित दिशा निर्देश एवं जानकारियाँ समय- समय पर देते रहे तो इससे साइबर क्राइम को कम किया जा सकता है साथ ही एटीएम ग्राहको को एटीएम प्रदान करते समय उन्हे बताया जाये कि बैंक उनसे एटीएम पिन नंबर के बारे में कभी भी नहीं पूछता है अगर कोई आपसे इस बारे में पूछे तो सतर्क हो जाएँ एवं कोई भी जानकारी साझा न करे तथा तुरंत इसकी सूचना पुलिस एवं संबन्धित बैंक को दे साथ ही एटीएम का प्रयोग करते वक्त किसी भी अनजान व्यक्ति से न ही कुछ पूछे और न ही कुछ बताएं, जब भी एटीएम में जाएँ ध्यान दे अकेले ही जाएँ अगर अंदर कोई है तो उसके जाने का इंतजार करें, ध्यान दे कि एटीएम में किसी भी प्रकार का कोई खुफिया कैमरा या वर्चुअल की बोर्ड पर पाउडर तो नहीं है अगर है तो तुरंत इसकी सूचना पुलिस एवं संबन्धित बैंक को दे । इस प्रकार से हम धोखाधड़ी की रोकथाम कर सकते हैं।

2.    तकनीकी उपकरणो का प्रयोग :- जब भी आप बैंक द्वारा प्रदान की गई ई- तकनीक का प्रयोग करें ध्यान दे केवल विश्वसनीय ई उपकरणो का ही उपयोग करें, हमेशा इनका प्रयोग सार्वजनिक एवं साइबर कैफे में करने से बचे, किसी भी व्यक्ति को अपना यूजर आईडी एवं पासवर्ड न दे, साथ ही इस बात का ध्यान दे कि हमेशा प्रत्येक 15 दिन में अपना पासवर्ड परिवर्तित करते रहें। वाईफ़ाई का उपयोग ध्यान पूर्वक करें, अपने दोस्तो को अपना ई- पासवर्ड साझा न करें, वाइरस एवं सुरक्षित कम्प्युटर यंत्रो का प्रयोग करे। इस प्रकार से हमारी सतर्कता  एवं सुरक्षा से ही हम धोखाधड़ी से रोकथाम कर सकते हैं।

3.    सावधानी एवं सतर्कता :- सतर्कता एवं सावधानी केवल बैंकिंग कार्य में ही नहीं अपितु आपके जीवन में हर कदम पर सहायता करती है अगर आप सावधान व सतर्क हैं तो आप सुरक्षित हैं किसी भी प्रकार कि लापरवाही आपको नुकसान पहुँचा सकती है इसी प्रकार से ई-बैंकिंग कार्य करते वक्त हमेशा पासवर्ड एवं क्रेडिट, डेबिट कार्ड कि नंबर किसी भी से साझा न करें, जब भी कार्य करे ध्यान रखे कि ये यंत्र सुरक्षित है।

4.    के वाई सी :- बैंकिंग प्रणाली में केवाईसी मापदंड सबसे महत्वपूर्ण हैं अगर आप इसका पालन करते हैं तो आप अपने आप को किसी भी प्रकार के जोखिम से बचा सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर आपने खाता खोलते समय आपका पता, मोबाइल नंबर, परिचय पत्र एवं एक परिचित का नाम व पता सही  दिये हैं तो बैंकिंग में किए गए हर प्रकार के व्यवहार का सीधा आपसे संबंध होता है यदि आपने चेक बूक या अन्य प्रकार के ई- बैंकिंग के लिए आबेदन दिया है तो सीधे आपको प्राप्त हो जाएगी यही नहीं हर प्रकार के लेनदेन कि जानकारी आपके पंजीकृत नंबर पर आ जाती है। इस प्रकार से केवाईसी मापदंड आपकी सुरक्षा के लिए हैं एवं हमेशा इनका पालन करना चाहिए।

5.   ई- लेन-देन तकनीकी का अधिक से अधिक प्रयोग:- अपने व्यवसायिक एवं अन्य रोज़मर्रा के कार्यों में हमें ई- लेन-देन का प्रयोग करना चाहिये क्योंकि इसमे जोखिम कम होने के साथ-साथ सुरक्षित भी होती है।

6.    पंचतंत्र :- साबधानी, रोकथाम, संरक्षण, परीक्षण एवं दृढ़ता से बैंकिंग में धोखाधड़ी को पूर्ण रूप से खत्म किया जा सकता है यह शाश्वत सत्य है कि उपर्युक्त पाँच तत्व के पालन करने से हर प्रकार के जोखिम से बचा जा सकता है क्योकि इन पाँच तत्वो से हर प्रकार से हर प्रकार के साइबर क्राइम से बचा जा सकता है आज सम्पूर्ण विश्व बैंकिंग क्षेत्र में साइबर क्राइम से निजात पाना चाहता है यह तभी संभव है इन पाँच तत्वो का प्रयोग किया जाये।

 

निष्कर्ष : - बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी सम्पूर्ण विश्व में एक चुनौती बनी हुहै प्राप्त आंकड़ो के अनुसार प्रतिवर्ष इसमे दुगनी रूप से वृद्धि हो रही है इसका प्रमुख कारण तकनीकी का इस्तेमाल अच्छे कार्यों में किया जाये तो यह विकास में योगदान देती है किन्तु समाज के कुछ असामाजिक तत्व इस तकनीकी का दुरुप्रयोग कर समाज को हानि पहुंचाते हैं वहीं दूसरी और कुछ तकनीकी खामियों की वजह से भी लोग शिकार हो जाते हैं किन्तु सम्पूर्ण बैंक इस संबंध में कड़े कदम उठा रहे हैं एवं भारतीय रिजर्व बैंक के प्रयास इस संबंध में सराहनीय हैं।

 

नाम: रामगोपाल साहू

सहायक प्रबन्धक (ऋण- वसूली व समीक्षा विभाग)

विजया बैंक, क्षेत्रीय कार्यालय

नागपुर